झुंझुनूं के किसान चुन्नी लाल खीचड़ ने मौरिंगा से बदली खेती की राह
झुंझुनूं | झुंझुनूं जिला मुख्यालय से करीब 18 किलोमीटर दूर मलसीसर ब्लॉक का गांव खीचड़ो का बास, बाजला। यहां खेतों में अब पारंपरिक फसलों के साथ खेती में नए प्रयोग भी दिखाई देने लगे हैं। सीमित पानी और पानी में लवणीयता जैसी चुनौतियों के बीच किसान नई फसलों की संभावनाएं तलाश रहे हैं।
इन्हीं किसानों में एक नाम है किसान चुन्नी लाल खीचड़ का, जिन्होंने पिछले करीब पांच वर्षों से सेहजने (मौरिंगा) की खेती को अपनाया है। कम पानी में तैयार होने वाली इस फसल को उन्होंने अपने खेतों की परिस्थितियों के अनुरूप विकसित किया और आज यह उनके लिए खेती में नवाचार और अतिरिक्त आमदनी का जरिया बन गई है।

पारंपरिक खेती से मौरिंगा तक का सफर
चुन्नी लाल खीचड़ पहले अपने खेतों में गेहूं, सरसों, चना, बाजरा और मूंग जैसी पारंपरिक फसलों की खेती करते थे। उनके क्षेत्र में ट्यूबवेल का पानी कुछ नमकीन है और फ्लोराइड की मात्रा भी अधिक बताई जाती है। ऐसे में उन्होंने ऐसी फसल की तलाश शुरू की जो स्थानीय परिस्थितियों में बेहतर तरीके से तैयार हो सके।
किसान बताते हैं कि रिसर्च और जानकारी जुटाने के बाद उन्होंने दक्षिण भारत से मौरिंगा के बीज मंगवाए। उन्होंने विशेष रूप से PKM-2 किस्म के बीज का चयन किया। शुरुआत में उन्हें करीब 3 हजार रुपये प्रति किलो की दर से बीज मिले और उन्होंने तीन किलो बीज मंगाकर खेती का प्रयोग शुरू किया।
13 बीघा में लगाए 2 हजार पौधे
चुन्नी लाल खीचड़ के अनुसार उन्होंने करीब 13 बीघा जमीन में लगभग 2 हजार पौधे लगाए। इसके बाद उन्होंने करीब 8 बीघा क्षेत्र में और मौरिंगा की खेती शुरू की है।
मौरिंगा की खेती में उन्होंने ड्रिप सिंचाई प्रणाली अपनाई है। ड्रिप सिस्टम से पौधों तक जरूरत के मुताबिक पानी पहुंचाया जाता है। किसान को ड्रिप सिस्टम पर राज्य सरकार की ओर से सब्सिडी भी मिली है।
उनका कहना है कि मौरिंगा के लिए ऐसी मिट्टी बेहतर रहती है जिसमें पानी जमा न हो। बालू मिट्टी में इसकी खेती अच्छी रहती है और पौधों की जड़ों में पानी रुकना नहीं चाहिए।
फली के लिए अलग, पत्तियों के लिए अलग दूरी
चुन्नी लाल खीचड़ ने अपने अनुभव के आधार पर बताया कि अगर मौरिंगा की खेती मुख्य रूप से फलियों के उत्पादन के लिए की जा रही है तो पौधों के बीच पर्याप्त दूरी रखना जरूरी है। उनके अनुसार लाइन से लाइन करीब 5 से 6 फीट और पौधे से पौधे की दूरी करीब 10 फीट रखी जा सकती है।
वहीं अगर उद्देश्य पत्तियों का उत्पादन है तो पौधों को अपेक्षाकृत कम दूरी पर लगाया जा सकता है। किसान करीब 4-4 फीट की दूरी पर लाइन लगाने की बात बताते हैं।
अगस्त का मौसम बताया अनुकूल
किसान के अनुसार मौरिंगा की खेती के लिए अगस्त का समय भी अनुकूल रहता है। हालांकि खेती का सही समय स्थानीय मौसम, मिट्टी और सिंचाई की परिस्थितियों के अनुसार तय करना जरूरी है।
मौरिंगा में सामान्य तौर पर बीमारी की समस्या बहुत ज्यादा नहीं आती। किसान बताते हैं कि बारिश के मौसम में कभी-कभार मकड़ी या कुछ कीटों का प्रकोप दिखाई दे सकता है। इसके लिए वे नीम, धतूरा और आक आदि से तैयार पारंपरिक घोल का छिड़काव करने की बात बताते हैं।
फली से लेकर पत्तियों तक उपयोग
मौरिंगा की खासियत यह है कि इसकी फलियों और पत्तियों, दोनों का उपयोग किया जाता है। मौरिंगा को पोषण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है और इसके पत्तों तथा अन्य हिस्सों का उपयोग खाद्य पदार्थों के साथ-साथ विभिन्न उत्पादों में किया जाता है।
किसान चुन्नी लाल बताते हैं कि मौरिंगा की मांग होने के कारण उन्हें अपनी उपज बेचने में विशेष परेशानी नहीं होती। हालांकि झुंझुनूं और आसपास अभी बड़ा स्थानीय बाजार उपलब्ध नहीं है, इसलिए उपज को जयपुर और दिल्ली की मंडियों तक भेजना पड़ता है।
50 से 150 रुपये किलो तक बिकती है फली
चुन्नी लाल खीचड़ के अनुसार मौरिंगा की फलियां बाजार में करीब 50 से 150 रुपये प्रति किलो तक के भाव में बिक जाती हैं। वास्तविक भाव गुणवत्ता, सीजन, मांग और बाजार के अनुसार बदल सकता है।
यानी जिस जमीन पर किसान पहले पारंपरिक फसलों के सहारे खेती करते थे, उसी जमीन पर उन्होंने एक नई फसल का प्रयोग कर खेती की संभावनाओं को विस्तार दिया है।
पांच साल का अनुभव बना दूसरे किसानों के लिए मिसाल
चुन्नी लाल खीचड़ की कहानी सिर्फ मौरिंगा की खेती की कहानी नहीं है। यह उस सोच की कहानी है जिसमें किसान अपनी स्थानीय परिस्थितियों, पानी की उपलब्धता और बाजार की मांग को समझकर खेती में बदलाव करता है।
रिसर्च करके बीज मंगाना, ड्रिप सिंचाई अपनाना, पौधों की दूरी का ध्यान रखना और उपज को स्थानीय बाजार से बाहर जयपुर-दिल्ली तक पहुंचाना—इन प्रयासों ने उनकी खेती को एक नया रास्ता दिया है।
झुंझुनूं जैसे अर्ध-शुष्क क्षेत्र में जहां पानी खेती की सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल है, वहां कम पानी में होने वाली फसलों की संभावनाएं किसानों के लिए नई उम्मीद पैदा कर सकती हैं। चुन्नी लाल खीचड़ का पांच साल का अनुभव बताता है कि सही जानकारी, प्रयोग और मेहनत के साथ किसान पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर नई संभावनाएं तलाश सकते हैं।
FM Jhunjhunu 90.0 की खास पेशकश
“खेत से आत्मनिर्भरता तक” की इस प्रेरक कहानी में चुन्नी लाल खीचड़ का मौरिंगा खेती का अनुभव उन किसानों के लिए भी सीख है, जो कम पानी और बदलती परिस्थितियों में खेती के नए विकल्प तलाश रहे हैं।
रिपोर्ट: FM Jhunjhunu 90.0
स्थान: खीचड़ो का बास, बाजला | मलसीसर, झुंझुनूं





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